कोरोना वायरस का मेरे परिवार की मानसिक स्थिति पर पड़ा काफी बुरा प्रभाव, ऐसी थी स्थिति

हेलो दोस्तों ! कोरोना वायरस को लेकर अपना पूरा अनुभव मैं आपके साथ साझा कर चुकी हूँ। हमारे परिवार में इसकी शुरुआत कहाँ से हुई, हमने इसमें क्या कुछ खाया-पिया और अस्पतालों में हमारा अनुभव कैसा रहा। लेकिन ये बीमारी शरीर के साथ साथ मानसिक स्थिति पर क्या असर डालती है, ये आपको आज मैं इस लेख में बताना चाहूंगी और Covid-19 को लेकर मेरे अनुभव और जानकारी से सम्बंधित ये आखिरी लेख है।

कोरोना वायरस एक घातक बीमारी है ये तो हम सभी जानते हैं, लेकिन इससे जुड़ी पूरी जानकारी अभी तक किसी के पास नहीं है। डॉक्टर हमारी सहायता अवश्य कर रहे हैं, लेकिन इस बीमारी को लेकर वो भी सब कुछ नहीं जानते और यही कारण है कि चिंता और भी बढ़ जाती है। कोविड-19 को लेकर लोगों के मन में एक भय है और ऐसे में अगर ये बीमारी हो जाती है तो शरीर के साथ मानसिक स्थिति कैसी होगी, यही बताने का प्रयत्न कर रही हूँ।

1. क्वारंटाइन होने पर मानसिक दबाव

Covid-19 की रिपोर्ट परिवार में किसी एक की भी पॉजिटिव हो तो तुरंत क्वारंटाइन में जाना पड़ता है। यही हमारे साथ भी हुआ, माँ-पापा अस्पताल के क्वारंटाइन वार्ड में दाखिल थे, मेरा भाई अपने घर में अकेला क्वारंटाइन था और हम तीन लोग अपने घर में बंद थे। कोई तैयारी का वक़्त नहीं मिलता, जो है जितना है उसी के साथ घर में बंद। ऐसे में जब हम बाहर बालकनी या छत्त पर जाते थे, तो लोग डर के मारे अपनी छत्तों से नीचे चले जाते थे, जबकि छत्तों के बीच लगभग 40 फुट का अंतर है। दो कमरों में लगभग 20 दिनों के लिए बंद, तबियत ठीक नहीं और ये भी नहीं पता कि आने वाले कल में तबियत कैसी होगी, ऐसे में हम सभी बहुत तनाव में थे। बीमारी के साथ मानो घर का पूरा माहौल तनावपूर्ण हो चुका था। मेरे बच्चे को ये समझाना कि क्वारंटाइन क्या है, हम बाहर क्यों नहीं जा सकते, मुश्किल था। दूसरी तरफ, मेरा भाई माँ-पापा की स्थिति को लेकर चिंता में था। रात-रात भर उसे अकेले नींद नहीं आ रही थी, क्योंकि डॉक्टर ने कहा था कि किसी भी दवा से उनका बुख़ार नहीं जा रहा और अगले दिन उनकी हालत क्या होगी, ये कहना मुश्किल था। हम सभी एक-दूसरे को तसल्ली देते रहे, लेकिन किसी के मन में चैन नहीं था।

दूसरी तरफ अस्पताल में मेरे माता-पिता को हमारी चिंता थी, कि जब इस रोग में उनकी हालत इतनी बुरी है, तो बच्चे अकेले घर पर कैसे सब कर पा रहे होंगे। वो भी मानसिक तनाव में थे कि कहीं हम बच्चों में से कोई अस्पताल में भर्ती न हो जाए।

साथ ही जब इस बीमारी के बारे में कुछ पता न हो, और जैसे कि शुरू में यानि कि अप्रैल-मई के महीनों में भारत में आइसोलेशन में रखा जाता था वैसे एक अकेले इंसान को उस समय ये बीमारी कितनी खतरनाक और तनावपूर्ण लगती होगी, अब मैं ये समझ सकती हूँ। उन दिनों में कई खबरें ऐसी भी आयीं कि कोरोना होने पर लोगों ने अस्पताल से कूदकर ही आत्म हत्या कर ली, लेकिन ये कतई सही नहीं हैं। मानसिक तनाव बहुत परेशान करता है, लेकिन ऐसा नहीं है कि आप ठीक नहीं होंगे। मैं जानती हूँ कि बीमारी और अकेलापन साथ में कितना परेशान करते हैं, लेकिन परिवार के लिए हिम्मत जुटाइये और भारत में तो ज्यादातर लोग इससे ठीक होकर ही वापस आ रहे हैं।

2. अनिश्चितता (Uncertainty)

कोरोना वायरस के पूरे दौर में हम हर समय एक असमंजस की स्थिति में थे। ज्यादातर का कहना था कि इस बीमारी में लक्षण 3-4 दिन बाद दिखते हैं और सबसे ज्यादा ये 7-8वें दिन खतरनाक होते हैं। ऐसे में हर समय अनिश्चितता थी कि अगले कुछ घंटे कैसे होंगे। शुरू के 4 दिन बहुत कमज़ोरी आयी, लेकिन अगले 4 दिन को लेकर मन में बहुत सवाल थे, कि क्या अगले दिनों कहीं कोई और लक्षण तो नज़र नहीं आएगा, कहीं अस्पताल जाने की ज़रूरत तो नहीं पड़ेगी। हममें से किसी को केवल बुख़ार रहा, किसी को गले में दर्द की शिकायत रही और मुझे केवल सांस की परेशानी रही। सभी के लक्षण अलग थे, सभी की कमज़ोरी की अवस्था भी पूरी तरह अलग थी और जो अस्पताल में थे, वो बेहद गंभीर थे। हमें कहीं से कोई आश्वासन शांति नहीं दे पा रहा था, बस जब 8 दिन निकल गए, तो थोड़ी चिंता कम हुई, कि शायद अब अस्पताल नहीं जाना पड़ेगा।

इन सबमें एक बात ये अच्छी थी, कि हमारे रिश्तेदारों में बाद में किसी और के परिवार को भी कोरोना पॉजिटिव पाया गया, लेकिन हमारी बेहतर हो रही स्थिति को देखकर उन्हें थोड़ी हिम्मत मिली और फ़ोन पर हम उन्हें खाने-पीने की जानकारी देते रहे, जिससे अब वो भी घर पर धीरे-धीरे स्वस्थ हो रहे हैं।

कोरोना में बच्चों की देखभाल

3. दिन गिनना

इस पूरे समय में हमने सिर्फ दिन गिने हैं और शुरू के 4 दिनों में तो ऐसा लगता था मानो घड़ी चल ही नहीं रही। कमज़ोरी इतनी थी कि टीवी या फ़ोन देख नहीं सकते थे, थोड़ा सा काम करके कमज़ोरी और बढ़ जाती थी, बस यही लग रहा था कि किसी तरफ 15-20 दिन निकल जाएँ। हमने कैलेंडर पर उस दिन को मार्क भी किया था, जिस दिन हमारे Covid-19 की रिपोर्ट पॉजिटिव आयी थी, कभी कभी मेरे पति को अक्सर मैं कैलेंडर के सामने खड़ा पाती थी। जैसे जैसे दिन निकल रहे थे, हम यही देखते रहे कि अब 10 दिन बाकी हैं, अब 8 दिन रह गए हैं और जब दोबारा टेस्ट करवाया और रिपोर्ट नेगेटिव आयी तभी चिंता थोड़ी कम हुई।

4. पूरे शरीर पर असर

कोरोना वायरस ऐसी बीमारी नहीं है, जो सिर्फ आपके फेफड़ों पर असर डाले, इसमें हमें शरीर के लगभग सभी हिस्सों पर असर नज़र आया। साथ ही कुछ स्टडी जो विदेशों में की गयी हैं उनके अनुसार भी ये शरीर के कई हिस्सों पर असर डालती है जैसे कि दिल, फेफड़े, किडनी इत्यादि। इस बीमारी में मुझे पूरे शरीर में दर्द और बहुत ज्यादा कमज़ोरी थी। साथ ही हमारे परिवार में किसी को गले में दर्द, जोड़ों में दर्द, बालों का झड़ना जैसे कई परेशानियां हुईं। शरीर इतने कमज़ोर थे कि कमर दर्द और सिर दर्द तो अक्सर रहा इस दौरान। ऐसे में शरीर में कहीं भी कोई नया दर्द होता था तो यही लगता था कि कहीं कोरोना और गंभीर तो नहीं हो रहा। बच्चे को एक छींक भी आयी, तो हम उसे कोरोना का लक्षण समझने लगते थे।

कोरोना का पूरे शरीर पर प्रभाव
source: CBSN

5. सही होने के बाद भी आत्मविश्वास की कमी

कोरोना वायरस होने पर आत्मविश्वास की कमी भी काफी आयी हम सभी में, क्योंकि हम अपने शरीरों में आज भी जो महसूस कर रहे हैं, उनसे लगता है जैसे कि इसने हमारे शरीर के अंदरूनी भागों को काफी नुक्सान पहुंचाया है। Covid-19 का दूसरा टेस्ट नेगेटिव आने के बाद भी और एक महीने से ज्यादा वक़्त गुज़र जाने पर भी शरीर पहले जैसे स्वस्थ महसूस नहीं कर रहा है और ना ही ये पता है कि पहले जैसी स्वस्थ अवस्था तक आने में अभी शरीर को और कितना समय लगेगा। अस्पताल से माँ-पापा घर तो आ गए हैं लेकिन डॉक्टर के अनुसार उन्हें 3-4 महीने अभी स्वस्थ होने में लग सकते हैं।

अब जब मैं ये लेख लिख रही हूँ तो बाहर देखने पर ये बरसात का मौसम सुहाना लग रहा है, ठंडी हवा आँखें बंद करने पर सुकून देती हैं, लेकिन अब से 1 महीने पहले न तो मौसम और न ही कुछ और अच्छा लगता था, बस यही लगता था कि किसी तरह ये बुरा वक़्त गुज़र जाए, क्वारंटाइन ख़त्म हो और हम सभी स्वस्थ हों।

कोरोना वायरस का मानसिक स्थिति पर असर काफी बुरा पड़ता है, ख़ासकर इसलिए क्योंकि बाकी बीमारियों में पूरा परिवार आपकी देखभाल करता है, अगर अस्पताल पहुँच जाएँ, तो कई रिश्तेदार वहाँ हिम्मत बँधाने पहुंचते हैं, लेकिन Covid-19 में इसके ठीक विपरीत आपको पूरी तरह से अकेला कर दिया जाता है, क्वारंटाइन में अकेले आपको खुद सब कुछ करना होता है। यहां ये सब लिखने का एक ही उद्देश्य है कि आप में से अगर कोई भी इस मानसिक स्थिति से गुज़र रहा है, तो आपको पता चल सके कि ऐसे आप अकेले नहीं हैं और शायद मेरे तजुर्बे से आपको महसूस हो कि और भी हैं जिनके साथ ऐसे हो रहा है और वो हिम्मत बाँध सकते हैं, तो आप क्यों नहीं। कहते हैं ना! वक़्त बुरा है, लेकिन है तो वक़्त ही, गुज़र जाएगा।

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About the Author: Pooja Choudhary

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