पार्ट 3- हमें कोविड-19 होने पर डॉक्टरों की बेरुखी और अस्पतालों के खराब अनुभव, जिन्हें टीवी पर कोई नहीं दिखाता

हेलो ! आशा करती हूँ कि आप सभी स्वस्थ हैं। मैं पूजा अपने कोविड-19 का अनुभव यहां साझा कर रही हूँ ताकि इस बीमारी से आप अवगत हो सकें और शायद किसी को कोई मदद भी मिल जाए। पिछले लेख में मैंने आपके साथ वो नुस्खे और खाने-पीने की चीज़ों के बारे में साझा किया जिन्हें मैंने इस बीमारी के दौरान अपनाया। फिलहाल मेरा पूरा परिवार ठीक है, लेकिन इस दौरान अस्पतालों को लेकर मेरी राय बदल गयी। टीवी में, न्यूज़ चैनलों पर जिस प्रकार दिखाया जा रहा है, अस्पताल और डॉक्टरों का हाल मुझे तो इसके विपरीत ही दिखा है। आज यही अनुभव मैं आपके साथ ज़रूर बांटना चाहूंगी कि डॉक्टर किस तरह से हमसे मिले या बातचीत की और सरकारी अस्पताल जहां अच्छी जांच का दावा किया जा रहा है वहाँ क्या हाल है।

जैसे कि सबसे पहले लेख में मैंने आपको बताया कि मेरे पापा का कोविड-19 टेस्ट पॉजिटिव आया। उन्हें बुख़ार बहुत ज़्यादा था। मेरा भाई उन्हें डॉक्टर के पास लेकर गया और डॉक्टर ने उन्हें हाथ लगाने से मना कर दिया और कहा कि पहले टेस्ट कराके आइये। कोरोना का टेस्ट तो मम्मी-पापा ने उसी दिन करवा लिया लेकिन रिपोर्ट आने में दो दिन लगते हैं और इन्हीं दो दिनों में उनकी हालात बहुत ज़्यादा बिगड़ गयी, नतीजा ये हुआ कि दूसरे दिन वो बेहोश गए और फ़िर उसी अस्पताल में जहां डॉक्टर ने कोरोना के डर से उनका चेक-अप नहीं किया था, उन्हें आई.सी.यू. में तुरंत भर्ती किया गया। आइसोलेशन वार्ड के आई.सी.यू. में भर्ती होने के कुछ दो घंटे बाद कोरोना की टेस्ट रिपोर्ट पॉजिटिव आयी। मेरी माँ जो कोविड-19 पॉजिटिव थीं, सोचिये पापा को अस्पताल में ऑक्सीजन लगे देखे उनकी हालात क्या होगी। आइसोलेशन वार्ड में किसी को मरीज़ के साथ रुकने की इजाज़त नहीं होती और आई.सी.यू. में मरीज़ को मोबाइल देना भी प्रतिबंधित था। घर पहुँचते ही भाई और मम्मी को क्वारंटाइन कर दिया गया। मैं भी उनसे मिलने नहीं जा सकती है।

इसके बाद जब देर रात मेरे पति को बुख़ार आया तो अगले दिन हमने एक जनरल फिजिशियन को फ़ोन पर संपर्क किया। डॉक्टर साहब से हमने विनती की कि वो हमें तुरंत कोविड-19 का टेस्ट लिखकर दें क्योंकि बिना डॉक्टर की पर्ची (prescription) के टेस्ट नहीं होता। ऐसे में डॉक्टर साहब का पहला जवाब आया कि एक prescription के 400 रूपए हैं, उस समय एहसास हुआ कि बिज़नेस कितना महत्वपूर्ण है डॉक्टरों के लिए भी। उनकी फीस गलत नहीं थी, लेकिन मरीज़ में क्या लक्षण है, दवाई क्या होनी चाहिए, मेरे पांच साल के बेटे की कोविड-19 पॉजिटिव आने पर देखरेख मुझे कैसे करनी चाहिए, इन सब सवालों के जवाबों से पहले उनकी फीस ज़रूरी थी, बस यही बात मुझे अच्छी नहीं लगी। ख़ैर, उस वक़्त उन्हें 1200 रूपए देकर वो पर्ची लेना जिसमें उन्होंने टेस्ट लिखे थे, मुझे ज़्यादा ज़रूरी लगा और मैंने वही किया। उन्होंने हमें prescription WhatsApp किये थे।

इसके बाद हम प्राइवेट अस्पताल में कोविड-19 टेस्ट कराने गए जहां 15,000 रूपए देकर बड़े आराम और सावधानी के साथ हमारे सैंपल लिए गए। इस फीस में हमारे दोनों सैंपल लिए गए जिसमें एक नाक और एक मुंह से लिया जाता है। जबकि सरकारी अस्पताल में आपको विकल्प चुनना होता है कि आप कौन सा सैंपल देना चाहते हैं – नाक से लिया जाने वाला रैपिड टेस्ट के लिए होता है और मुंह से जो लिया जाता है, उसकी रिपोर्ट आने में 2 दिन का समय लगता है। यहां प्राइवेट अस्पताल में दोनों सैंपल लिए गए और न हमें किसी लाइन में लगना पड़ा और न ही लम्बा इंतज़ार था। इसके बाद टेस्ट की रिपोर्ट आते ही हमने अपने डॉक्टर को संपर्क किया और उन्होंने हमें कोई दवा ना लेने को कहा। बस उन्होंने यही कहा कि बच्चे को अगर जुक़ाम हो तो उसकी दवा दे देना। लेकिन हमें न संतुष्टि थी और न चैन। हमारे किसी जानकार की सहायता से हमें एक और डॉक्टर की सलाह मिली जो एक बड़े अस्पताल में कोविड इंचार्ज थे और उन्होंने भी हमें यही कहा कि अगर बुख़ार ज्यादा नहीं है और सांस लेने में परेशानी नहीं है तो अस्पताल बिल्कुल न जाएँ और घर पर ही इसका इलाज करें। इसके बाद मेरे पति के दफ्तर में एक जानकार की मम्मी भी कोविड विभाग में काम करती थीं, उन्होंने भी हमारी उम्र के लोगों के लिए घर पर इलाज को बेहतर विकल्प बताया। हालांकि हम बहुत डरे हुए थे, ऐसे में उन्होंने हमें घर पर एक ऑक्सीमीटर रखने की सलाह दी, ताकि हम शरीर में ऑक्सीजन लेवल को मापते रहें और चिंता ज्यादा न करें।

कोरोना की टेस्ट रिपोर्ट आने के बाद से हर घंटे हम इसी डर में थे, कि कहीं आगे तबियत और बिगड़ ना जाए। इंटरनेट पर हर जगह यही लिखा है कि सातवें-आठवें दिन इस बीमारी के लक्षण कई बार भयावह रूप ले लेते हैं। एक सप्ताह बहुत ज्यादा डरावना था क्योंकि बीमारी अज्ञात थी और पता नहीं था कि आगे क्या होगा।

इसी बीच एक रात मेरे पति को अचानक सांस लेने में तकलीफ हुई और रात 1.30 बजे हम अस्पताल पहुंचे जहां इमरजेंसी विंग में पहुँचते ही मैंने उन्हें बताया कि ये Covid पॉजिटिव हैं और इन्हें सांस लेने में तकलीफ है और उन्हें हमें तुरंत बाहर जाने को कहा। इसके कुछ देर बाद वो लोग पूरी किट पहनकर आये और फिर पुछा क्या समस्या है। समस्या बताने पर उन्होंने कहा कि लगभग 6 किलोमीटर दूर आप हमारे अस्पताल की दूसरी शाखा में जाएँ, हमारे पास बेड उपलब्ध नहीं है। इसके बाद हम अस्पताल से बाहर आये और खुली हवा में कुछ देर खड़े रहने के बाद उन्हें ठीक तरह से सांस आने लगी और फिर हम घर लौट आये। घर लौटते हुए उन्हें एहसास हुआ कि उन्हें शायद दवाइयों के कारण गैस हो गयी है और उसी की वजह से उन्हें सांस लेने में बेचैनी हुई है और इसी डर ने हमें अस्पताल पहुंचा दिया। इस एक सप्ताह के बाद हमारा डर काफी कम हो गया, लेकिन शरीर बहुत कमज़ोर थे।

लगभग 17 दिन के बाद हमने दोबारा कोविड-19 का टेस्ट करवाने का विचार बनाया लेकिन टेस्ट बहुत महंगा था। फिर हमारी तबियत में थोड़ा सुधार था, इसीलिए हमने सरकारी अस्पताल जाना उचित समझा जहां कोविड-19 टेस्ट मुफ्त होते हैं। हमने खुद अपने निकटतम सरकारी डॉक्टर जो कि हमारे क्षेत्र की इंचार्ज जैसी थीं, उन्हें संपर्क किया। सबसे पहले तो वो इस बात से हैरान थीं, कि हमारे कोविड पॉजिटिव होने की उन्हें कोई ख़बर नहीं थी, यानि कि प्राइवेट अस्पताल से हमारे टेस्ट की रिपोर्ट सरकारी स्वास्थ्य विभाग तक पहुंची ही नहीं। उन्होंने सबसे पहले मुझसे यही कहा कि उस लैब का नाम बताएं जहां हमने टेस्ट करवाए। उन्हें ये जानकर बहुत हैरानी थी कि सरकारी स्वास्थ्य विभाग तक हमारे कोविड-19 पॉजिटिव होने की जानकारी पहुंची ही नहीं, ना ही किसी का हमें कोई फ़ोन आया और ना ही हमारे घर पर क्वारंटाइन का कोई पर्चा लगा। हालांकि इसमें हमारी कोई गलती नहीं थी, ये समझते हुए उन्होंने हमें दोबारा टेस्ट करवाने के लिए सिविल अस्पताल भेज दिया। हम वहाँ गए तो उन्होंने कहा कि कल आना। हमें पूछा कि क्या इस समय कोविड-19 के टेस्ट नहीं होते तो उन्होंने कहा कि होते हैं, लेकिन आज मरीज़ कम आये थे इसलिए हमने जल्दी सैंपल लेना बंद कर दिया और हम केवल आप तीनों के लिए नयी पी.पी.ई. किट निकालकर कोविड-19 टेस्ट नहीं कर सकते।

इसके बाद अगले दिन डॉक्टर ने हमें दूसरे अस्पताल भेजा जहां पहुंचकर हमने पर्ची बनवायी और ये देखकर मैं हैरान थी कि कोरोना के मरीज़ हों, गर्भवती औरत हो या किसी बच्चे को सर्दी जुखाम के लिए दिखाना हो, पर्ची पर नंबर डलवाने के लिए सभी की लाइन एक ही थी। सोचिये ऐसे में अगर कोरोना नहीं भी होगा, तो भी होना तय है। इसके बाद इसी अस्पताल में अलग दो कमरे बने थे जहां साफ़-सफाई का नामो-निशान दूर तक नहीं था। कहीं सीमेंट पड़ा था, कहीं कुत्तों की गंदगी थी, कहीं कंकर पड़े थे और चारों तरफ मिट्टी। कोरोना का टेस्ट करवाने आये लोगों के लिए न तो कोई बेंच था और ना ही कोई टेंट या टीन का इंतज़ाम जिसके नीचे लाइन लग सके। भरी धूप में मैं लाइन में लगी और मेरे बच्चे को मैंने पति के साथ काफी दूर कहीं छाँव में खड़ा किया क्योंकि उस लाइन में कितने पॉजिटिव मरीज़ थे, कौन जानता था। धूप में मुझसे आगे लाइन में लगभग 30-40 लोग थे और 20 लोग शायद मेरे पीछे खड़े थे। लगभग 1.5 घंटे धूप में खड़े होने के बाद अचानक कोविड-19 टेस्ट के लिए सैंपल लेने वाली औरत ने कहा कि टेस्ट किट ख़त्म हो गयी,अब आप सब घर जाइये, सोमवार को आना। अचानक गुस्सा आया और मैंने कहा कि यही बात आप पहले बता देतीं, तो धूप में क्यों खड़े होते। मोहतरमा ने जवाब दिया कि केवल सौ टेस्ट आती हैं एक दिन के लिए, अब आप जाओ। मैंने पूछा कि फिर आप सौ से ज्यादा मरीज़ों की पर्ची क्यों काटते हैं, इसका उनके पास कोई जवाब नहीं था। फिर भी जितने लोगों ने मेरे आगे टेस्ट करवाए उनमें से 60 प्रतिशत लोगों की रैपिड टेस्ट रिपोर्ट पॉजिटिव ही आयी और उस लाइन में 2 साल के बच्चे से लेकर 70 वर्ष के बुज़ुर्ग तक सभी खड़े थे, लाइन में भी सोशल डिस्टन्सिंग का पालन करवाने वाला कोई नहीं था। जिनकी कोविड-19 टेस्ट रिपोर्ट मेरे सामने पॉजिटिव आयी, उन्हें कहा गया जाकर डॉक्टर को दिखा लो। कुछ ऐसा हाल था जैसे कि सरकारी अस्पताल में लोग कोरोना बाँट रहे हों।

फिर तीसरे दिन डॉक्टर को हमने दुबारा संपर्क किया। इस बार मानो हमें एक अच्छी सरकारी डॉक्टर मिलीं जिन्होंने हर बार फ़ोन पर हमसे बहुत विस्तार से बात की और उन्हें फ़ोन करने से पहले हमें संकोच नहीं होता था । इसके बाद अगले दिन हम फिर वहीँ सिविल अस्पताल पहुंचे जहां अस्पताल के पीछे किसी पुरानी बंद पड़ी लैब को कोरोना टेस्ट सेंटर में तब्दील किया गया था। लेकिन यहां ये चीज़ अच्छी थी कि कोरोना के मरीज़ों के लिए जगह अलग थी, जिससे अस्पताल में आये बाकी लोग उनसे अलग और सुरक्षित थे। वहाँ दो बूथ बनाये हुए थे जहां एक में रैपिड टेस्टिंग और दुसरे में दूसरी टेस्टिंग जारी थी, जिसकी रिपोर्ट दो दिन में आती है। अंदर दोनों लाइनों के बीच में बारिश का पानी जमा हुआ पड़ा था, लेकिन यहां कच्ची ज़मीन में टेस्ट सेण्टर के ठीक बाहर कुछ पुरानी कुर्सियां तो पड़ी थीं, लेकिन सफाई तो आप भूल ही जाइये। खैर किसी तरह हमारा टेस्ट हुआ और रिपोर्ट नेगेटिव आयी, बहुत सुकून मिला। एक कम्पाउण्डर जैसा व्यक्ति जिसने कोई पी.पी.ई. किट नहीं पहना था, उसने मुझे बताया कि रिपोर्ट नेगेटिव है, लेकिन कोई रिपोर्ट हाथ में नहीं मिलती। ऐसे में मेरे कहने पर वो अंदर गया और डॉक्टर से लिखवाकर और स्टैम्प लगवाकर आया।

इसके दो दिन बाद मेरे मम्मी-पापा की स्थिर हालत को देखते हुए उन्हें भी प्राइवेट अस्पताल से छुट्टी मिल गयी, लेकिन उनका बिल देखने लायक था जिसमें डॉक्टर के पी.पी.ई. किट और मास्क के पैसे भी हमारे बिल में जुड़े हुए थे और सिर्फ इन्हीं का बिल 80,000 रूपए से ऊपर था। इसमें मेरी मम्मी के बिल पर पी.पी.ई. किट का बिल कुछ 38,000 रूपए था और बाकी पापा के नाम पर दर्ज था, जबकि वो एक ही पी.पी.ई. किट पहनकर सारे मरीज़ों को देख रहे थे और हर मरीज़ से रोज़ दो पी.पी.ई. किट की कीमत वसूल रहे थे। पी.पी.ई. किट और मास्क, सैनिटाइज़र जैसे डिस्पोजेबल मेडिकल इंश्योरेंस में भी कवर नहीं होते। ऐसे में आप खुद ही सोचिये कि एक साधारण सा व्यक्ति किस प्रकार किसी भी प्राइवेट अस्पताल में अपना इलाज करवा पायेगा?

हालांकि इस सब में मैं बहुत हैरान इसीलिए हुए क्योंकि एक तरफ छोटे सरकारी अस्पताल में कोई ढंग के इंतज़ाम नहीं हैं और प्राइवेट अस्पतालों में ये रोग पैसे कमाने का सबसे अच्छा ज़रिया है। ऐसे में जो डॉक्टर वाकई में बढ़ चढ़कर दिन-रात एक करके मरीज़ों की सेवा कर भी रहे हैं, उनका भी नाम इन कारणों से खराब हो जाता है।

अपने अनुभव से कुछ महत्वपूर्ण चीज़ें जो मैं आपसे यहां अवश्य कहूँगी।

  • अगर आपको खुद में कोरोना के लक्षण हल्के दिखते हैं, तो बेहतर है कि आप अपने इलाके के मुख्य सरकारी अस्पताल में ही कोरोना टेस्ट करवाएं, क्योंकि यहां टेस्ट मुफ्त भी होंगे और सरकारी विभाग द्वारा बार बार कॉल करके आपको डॉक्टर की सलाह और इलाज घर पर ही मिल सकेंगे।
  • प्राइवेट अस्पताल में दवा तो आपकी काफी सारी दे दी जाएंगी लेकिन हम सभी जानते हैं कि इसकी फिलहाल कोई सटीक दवा नहीं है और यहां बिल भी लम्बा ही आता है।
  • जब तक सांस लेने में कोई तकलीफ नहीं है और आपकी उम्र कम है तो आप घर पर अपनी देखभाल बेहतर कर सकते हैं।
  • बेचैनी और गैस जैसी समस्याओं से भी आपको ऐसा लग सकता है कि सांस लेने में तकलीफ हो रही हो, तो इसे में ऑक्सीमीटर घर पर अवश्य रखें।
  • अगर आप कोविड पॉजिटिव हैं तो डॉक्टर आपके पास आने से डरेंगे और प्राइवेट अस्पतालों में ये डर हमें ज्यादा देखने को मिला।
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About the Author: Pooja Choudhary

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