दुनिया को दिशा दे सकते है भारत आशियान संबंध

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली में आशियान देशों के सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए इन दस देशों से अपने सदियों पुराने रिश्तों का जिक्र करते हुए भविष्य की संभावनाओं को रेखांकित किया। उन्होंने आशियान देशों के साथ सुरक्षा और व्यापार के क्षेत्र में सहयोग का प्रस्ताव रखा। सम्मेलन का आयोजन भारत के आशियान से संबंधों की पच्चीसवीं वर्षगांठ को मनाने के लिए किया गया था। आशियान की अध्यक्षता की जिम्मेदारी भी सिंगापुर को दी गई। भारत में मौजूद सभी दस देशों के प्रमुख गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में हिस्सा लेंगे। ऐसा स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार हो रहा है।

आशियान की स्थापना पचास साल पहले 1967 में हुई थी। मूल रूप से इसके दस सदस्य थे। बाद में इसमें भारत, चीन और आस्ट्रेलिया समेत छह अन्य देशों को भी शामिल किया गया। भारत 1992 में लूक ईस्ट नीति के तहत इस ब्लाक का हिस्सा बना। दक्षिण पूर्व एशिया के इन देशों से भारत के सदियों पुराने रिश्ते है। महात्मा बुद्ध और रामायण भारत को इन देशों से बांधते है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इन देशों से तीन सी – कल्चर, कामर्स और कनेक्ट पर जोर दिया। लेकिन एक और सी यानि चीन भी अघोषित प्रमुख मुद्दा है। आशियान के देश चीन की दादागिरी से परेशान है।

आशियान के सभी देश छोटे और समुन्द्र में स्थित है। दुनिया का ज्यादातर व्यापार इसी समुंद्री रास्ते से होता है। लेकिन चीन की विस्तारवादी नीतियां इन देशों के लिए खतरा बनी है। फिलीपींस और वियतनाम से चीन का टकराव जगजाहिर है। चीन समुंद्री रास्ते की आवाजाही में भी बाधा उतपन्न करता रहता है। भारत इन देशों से सड़क मार्ग से सम्पर्क कर सी पैक का विकल्प देने का इरादा भी रखता है। इसमें भारत को अमेरिका और आस्ट्रेलिया का भी समर्थन प्राप्त है। इस दृष्टि से भारत आशियान संबंध दुनिया के दूरगामी असर डालने वाले होंगे।

अमित यायावर

aakritipr@gmail.com

 

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