कांग्रेस के लिए संकटमोचन साबित हो सकते है राहुल गाँधी

गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधान सभा चुनाव में हार की आशंका के बीच आखिर राहुल गाँधी की सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस के प्रधान के पद पर ताजपोशी हो ही गई। राहुल ने अपनी माता सोनिया गाँधी से पदभार ग्रहण किया। सोनिया गाँधी सबसे ज्यादा समय उन्नीस साल तक कांग्रेस की प्रधान रहने वाली अकेली भाग्यशाली शख्शियत है। राहुल कांग्रेस के 87 प्रधान है। नेहरू गाँधी परिवार के इस पद पर बैठने वाले वे छठें व्यक्ति है।

पद ग्रहण के मौके पर अलग अलग मानवीय भावनाएं देखने को मिल रही थी। ढोल नगाड़ों के बीच नृत्य करते कांग्रेस कार्यकर्ता उत्साह से लबरेज थे। अपनी सास इंदिरा गाँधी और पति राजीव गाँधी की शहीदी देख चुकी सोनिया गाँधी अपनी अगली पीढ़ी को काँटों का ताज पहनाते हुए भावुक थी। खुद राहुल गाँधी अपने अतीत के प्रदर्शन और भविष्य की योजनाओं के बीच आशंका से भरे थे। कांग्रेस की पूरी जमात को राहुल में उम्मीद की एक किरण दिख रही है।

कांग्रेस में इस समय चारों तरफ निराशा का आलम है। लोकसभा में कांग्रेस की अब तक की सबसे कम संख्या है। एक के बाद एक राज्य हाथ से निकलते जा रहे है। राज्यों में हार के साथ ऊपरी सदन राजयसभा का भी गणित बदल रहा है। बहुत से राज्यों में जमीनी स्तर पर संगठन का ढांचा बिखर चुका है। यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में पार्टी क्षेत्रीय दलों के रहमो करम पर है। इससे बुरा कुछ वक्त होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। शुक्र है कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व में बगावत के कोई स्वर नहीं सुन रहे।

गर्दिश के इस आलम में राहुल गाँधी का नेतृत्व कांग्रेस के लिए वरदान साबित हो सकता है। ऐसा ही करिश्मा सोनिया गाँधी ने 2004 के लोकसभा चुनाव में सोनिया गाँधी ने भाजपा के इंडिया शाइनिंग के नारे के खिलाफ मजबूत गठबंधन खड़ा कर किया था। भाजपा के विरोध के बाद प्रधानमंत्री बनने का लोभ त्याग कर भी सोनिया गाँधी ने मिसाल कायम की थी। राहुल इस परम्परा को आगे बढ़ा सकते है। पदभार लेने के समय भाजपा की विभाजनकारी नीतियों का विरोध जाता कर राहुल ने अपने इरादे साफ़ कर दिए है।
अमित यायावर

aakritipr@gmail.com

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